रामायण : 6.हनुमान का जन्म
हनुमान का जन्म: वाल्मीकि रामायण और रामकीर्ति के दृष्टिकोण
हनुमान, भारतीय पौराणिक कथाओं के सबसे प्रिय और शक्तिशाली पात्रों में से एक हैं। उनकी कथा रामायण के विभिन्न संस्करणों में अनोखे रूपों में प्रस्तुत की गई है। विशेषकर, वाल्मीकि रामायण और रामकीर्ति में उनके जन्म और अद्वितीय जीवन के विभिन्न पहलुओं का वर्णन किया गया है। आइए इन कथाओं को रोचक तरीके से समझें।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार
वाल्मीकि रामायण में उल्लेख है कि सुमेरु नामक पर्वत, जो सूर्यदेव के वरदानस्वरूप स्वर्णमय था, पर हनुमान के पिता केसरी राज्य करते थे। केसरी की पत्नी अंजना, जो अद्भुत गुणों की धनी थीं, हनुमान की माता थीं। जब भगवान विष्णु ने राजा दशरथ के यहां राम के रूप में अवतार लिया, तब ब्रह्माजी ने देवताओं को आदेश दिया कि वे भगवान विष्णु की सहायता के लिए विशेष गुणों वाले पुत्रों की सृष्टि करें।
देवताओं के आदेश पर वायुदेव ने अंजना के गर्भ से हनुमान का जन्म कराया। हनुमान वायुदेव के औरस पुत्र थे। उनका शरीर वज्र के समान मजबूत, गति गरुड़ के समान तीव्र और बुद्धिमत्ता तथा बल में अद्वितीय था।
एक दिन, जब अंजना फल लाने के लिए वन में गईं, तो हनुमान भूख से व्याकुल होकर रोने लगे। उन्होंने आकाश में लाल रंग के सूर्य को देखा और उसे फल समझकर उसकी ओर उड़ चले। वायुदेव अपने पुत्र को सूर्य की गर्मी से बचाने के लिए उनके पीछे-पीछे गए। सूर्य ने हनुमान को बालक समझकर उन्हें कोई क्षति नहीं पहुंचाई।
इसी समय राहु सूर्यग्रहण के लिए आया। हनुमान ने राहु को भी फल समझकर पकड़ने की कोशिश की। भयभीत राहु ने इंद्र से शिकायत की। इंद्र ने गजराज ऐरावत पर सवार होकर हनुमान पर वज्र से प्रहार किया, जिससे वे पहाड़ पर जा गिरे और उनकी ठुड्डी टूट गई। इसी घटना के कारण उनका नाम "हनुमान" पड़ा।
हनुमान के गिरने से क्रोधित वायुदेव ने वायु का प्रवाह रोक दिया, जिससे प्राणियों का जीवन संकट में आ गया। ब्रह्माजी और अन्य देवताओं ने वायुदेव को शांत किया और हनुमान को अनेक वरदान दिए।
इंद्र ने उन्हें अवध्य होने का वरदान दिया। सूर्य, वरुण, यम, शंकर, और अन्य देवताओं ने भी उन्हें अनेक शक्तियां प्रदान कीं। ब्रह्माजी ने कहा कि हनुमान दीर्घायु, महात्मा, और अद्वितीय योद्धा बनेंगे।
बालक हनुमान शक्तियों से ओतप्रोत होकर ऋषियों के आश्रमों में शरारतें करने लगे। इससे क्रोधित होकर भृगु और अंगिरा ऋषियों ने उन्हें शाप दिया कि वे अपने बल को भूल जाएंगे और किसी के स्मरण दिलाने पर ही उन्हें अपनी शक्ति का आभास होगा।
रामकीर्ति के अनुसार
रामकीर्ति में हनुमान के जन्म की कथा एक अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत की गई है। इसमें काल-अचना की पुत्री स्वाहा को एक शाप दिया गया था कि वह एक हाथ से टहनी पकड़कर हवा से ही अपना भरण-पोषण करेगी। उसे शाप से तभी मुक्ति मिलेगी जब वह एक शक्तिशाली वानर बालक को जन्म देगी।
भगवान विष्णु ने राक्षसों से युद्ध में राम की सहायता के लिए अपनी शक्तियां वायु में स्थानांतरित कीं। वायुदेव ने इन शक्तियों को स्वाहा के मुख में रख दिया, जिससे उसने गर्भ धारण किया। तीस महीने के लंबे अंतराल के बाद, उसने एक सुंदर, शक्तिशाली वानर बालक को जन्म दिया, जो दिखने में सोलह वर्ष का लगता था।
हनुमान के जन्म के समय उनके शरीर पर विशेष चिन्ह थे—कानों में कुंडल, चमकीले श्वेत दांत, और सफेद घुंघराले बाल। ये चिन्ह केवल नारायण के अवतार राम को दिखाई देते, और वे ही हनुमान की सेवा के योग्य थे।
बालक हनुमान की शरारतें देवी उमा के बगीचे तक जा पहुंचीं। बगीचा नष्ट करने पर देवी उमा ने उन्हें शाप दिया कि उनकी शक्तियां कम हो जाएंगी। परंतु हनुमान की प्रार्थना पर उन्होंने वरदान दिया कि राम के शरीर का स्पर्श होने पर उनकी शक्तियां पुनः जागृत होंगी।
इसके बाद, वायुदेव ने उन्हें भगवान विष्णु के पास ले जाकर रूप बदलने और अदृश्य होने की कला सिखाई। उन्हें अमरत्व का वरदान भी दिया गया। हनुमान अपने मामाओं, बाली और सुग्रीव के पास गए और उनके देश खिडकिन में बस गए।
उल्लेखनीय अंतर
पिता का विवरण:
वाल्मीकि रामायण में हनुमान के पिता केसरी बताए गए हैं।
रामकीर्ति में केसरी का उल्लेख नहीं है।
शक्ति का स्रोत:
वाल्मीकि रामायण में हनुमान को देवताओं के वरदान से शक्ति मिली।
रामकीर्ति में उनकी शक्ति भगवान विष्णु के अस्त्रों से बनी बताई गई है।
शाप और शक्ति:
वाल्मीकि रामायण में ऋषियों के शाप के कारण हनुमान अपनी शक्ति भूल गए।
रामकीर्ति में देवी उमा के शाप से उनकी शक्ति कम हो गई।

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