रामायण : 13.राम का दंडकारण्य के लिए प्रस्थान

राम का दंडकारण्य के लिए प्रस्थान

वाल्मीकि रामायण के अनुसार

भरत के अयोध्या लौटने के बाद, राम ने भी पंचवटी छोड़ने और आगे दंडकारण्य के जंगलों में जाने का निर्णय किया। इस निर्णय के पीछे कई कारण थे। रास्ते में वे अत्रि ऋषि के आश्रम पहुँचे। यहाँ अत्रि ऋषि ने अपनी पत्नी अनुसूया का परिचय सीता जी से करवाया। अनुसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी और उन्हें आभूषण भेंट किए। इसके बाद, राम ने तपस्वी ऋषियों से अनुमति लेकर लक्ष्मण और सीता के साथ दंडक वन में प्रवेश किया।

दंडकारण्य में प्रवेश करते ही, राम ने कई ऋषि-मुनियों के आश्रम देखे। वहीं उनकी भेंट एक भयानक नरभक्षी राक्षस विराध से हुई। विराध का आकार विकराल था, और उसकी गर्जना से पूरा जंगल गूँज उठा। विराध ने सीता को पकड़कर गोद में उठा लिया और राम-लक्ष्मण को धमकाने लगा। उसने बताया कि वह राक्षस जाति का है और ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त होने के कारण किसी भी शस्त्र से मारा नहीं जा सकता।

राम और लक्ष्मण ने विराध से भयंकर युद्ध किया। जब विराध हारने लगा, तब उसने बताया कि वह पहले तुम्बुरु नामक गंधर्व था, जिसे कुबेर ने राक्षस बनने का शाप दिया था। उसने राम को यह भी बताया कि उनका वध करने से वह शापमुक्त होकर अपने वास्तविक रूप में लौट जाएगा। राम और लक्ष्मण ने विराध को परास्त किया और उसका अंतिम संस्कार किया।


राम की शरभंग ऋषि से भेंट

विराध के वध के बाद राम शरभंग मुनि के आश्रम पहुँचे। शरभंग मुनि ने राम का स्वागत किया और उन्हें धर्म, तपस्या, और ब्रह्मचर्य की महत्ता समझाई। मुनि ने राम को यह भी बताया कि थोड़ी दूरी पर सुतीक्ष्ण ऋषि का आश्रम है। मुनि ने राम की अनुमति से अग्नि में प्रवेश कर शरीर त्याग दिया और ब्रह्मलोक चले गए।

शरभंग ऋषि के ब्रह्मलोक जाने के बाद, कई ऋषि-मुनि राम के पास आए और उनसे अपनी समस्या साझा की। उन्होंने बताया कि दंडकारण्य के जंगलों में राक्षसों द्वारा ब्राह्मणों और ऋषियों को सताया जा रहा है। राम ने उनकी रक्षा करने का वचन दिया। इसके बाद राम सुतीक्ष्ण ऋषि के पास गए। ऋषि ने उन्हें अपने ही आश्रम में रुकने का सुझाव दिया, लेकिन राम ने विनम्रता से मना कर दिया। सुतीक्ष्ण ऋषि ने उन्हें दंडकारण्य में अन्य ऋषियों के आश्रमों में जाने का मार्ग सुझाया। राम ने अगले दस वर्ष इन्हीं ऋषियों के सान्निध्य में व्यतीत किए।


रामकीर्ति के अनुसार

रामकीर्ति के अनुसार, भरत और अन्य परिजनों के अयोध्या लौटने के बाद, राम ने पंचवटी से प्रस्थान का विचार किया। उन्होंने सोचा कि कहीं उनकी माता और अन्य परिजनों से अचानक भेंट न हो जाए, जिससे उनका त्याग व्यर्थ हो।

राम रास्ते में राजा सुदर्शन और उनकी पत्नी सुक्खई से मिले। ये दोनों वानप्रस्थी जीवन बिता रहे थे। राजा ने राम को अपने साथ रुकने का आग्रह किया, लेकिन राम ने इसे अस्वीकार कर दिया।

आगे बढ़ते हुए राम एक बगीचे में पहुँचे, जिसका स्वामी बिरवा नामक राक्षस था। बिरवा ने महासागर और अग्नि देव से शक्तियाँ प्राप्त कर ली थीं। जब राम और लक्ष्मण उस बगीचे से गुजर रहे थे, तो बिरवा के राक्षस सैनिकों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। लक्ष्मण ने उन सभी को परास्त कर दिया।

बिरवा जब वापस लौटा, तो उसने अपने सैनिकों की दुर्दशा देखी। वह राम और लक्ष्मण से बदला लेने के लिए आया, लेकिन उनकी वीरता के सामने टिक नहीं सका। राम और लक्ष्मण ने मिलकर उसका वध कर दिया।


वाल्मीकि रामायण और रामकीर्ति का तुलनात्मक अध्ययन

  1. अत्रि ऋषि और राजा सुदर्शन
    वाल्मीकि रामायण में राम की भेंट अत्रि ऋषि और उनकी पत्नी अनुसूया से होती है। वहीं, रामकीर्ति में राजा सुदर्शन और उनकी पत्नी सुक्खई से। दोनों कथाओं में राम को रुकने का आग्रह किया जाता है, जिसे वे अस्वीकार कर देते हैं।

  2. विराध और बिरवा
    वाल्मीकि रामायण में विराध पहले गंधर्व था, जिसे कुबेर के शाप से राक्षस बनना पड़ा। राम ने उसे शापमुक्त किया। रामकीर्ति में बिरवा एक शक्तिशाली राक्षस था, जिसका वध राम और लक्ष्मण ने किया।

  3. ऋषियों का मार्गदर्शन
    दोनों कथाओं में राम को ऋषियों का मार्गदर्शन मिलता है। वाल्मीकि रामायण में शरभंग ऋषि और सुतीक्ष्ण ऋषि का उल्लेख है, जबकि रामकीर्ति में राजा सुदर्शन प्रमुख भूमिका निभाते हैं।



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